एक किसान की पहल ने बदली ढाणी की दशा व दिशा II RAJASTHAN EXPRESS

40 साल पहले सिखाया सोखती कुई बनानाआज ढाणी की बनी अलग पहचान
 झुंझुनू। जी हांभले ही ऐसा सुनकर आपको अटपटा लगे लेकिन यह सच है। झुंझुनू मुख्यालय से सटी भैड़ा की ढाणी में यह हकीकत देखी जा सकती है। जल प्रबंधन की दिशा में करीब चार दशक पहले यहां शुरू की गई पहल अब रंग दिखाने लगी है। बचपन से मिले जल संस्कार की बदौलत आज ढाणी का हर नागरिक ही नहीं अपितु बच्चा-बच्चा स्वस्थ और तंदुरुस्त है।
जीवन का एक शतक पूरा करने के करीब पहुंच चुके भूराराम भैड़ा (97) ढाणी के लोगों के लिए मसीहा से कम नहीं है। चुंधियाई हुई सी आंखों से बुजुर्ग भूराराम आज भी कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखते हैं। हमने देखा कि दोपहर में खाना खाने के बाद घर में बने करीब डेढ़ दर्जन वेस्ट वाटर स्ट्रक्चर सुधारने संभालने में जुट जाते हैं। बकौल भूरारामढाणी के लोग हमेशा से ही समझदार थे। सब इकट्ठे होकर बैठते थे और बड़े बुजुर्गों की बात मानते थे। उनका तीसरे नंबर का लड़का हरफूल सिंह जो फिलहाल आर्मी की इंजीनियरिंग रेजीमेंट में  कर्नल हैक्रिएटिव माइंड रखता है। एक बार गांव में गंदगी के कारण जल जनित बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया था। हरफूल सिंह ने सोखते गड्ढे बनाने का आईडिया दिया। गांव के लोगों ने उसकी बात मानी। मेरे साथ जगदीशबीरबलगणपतपरसुरामभैरूरामतुलसाराम आदि जुट गए और हमने गांव में सोखती कुईया बनाने का मिशन चला दिया। कुछ ही महीनों में गांव की गंदगी खत्म होने लगी। तब से लेकर आज तक गांव के लोग सोखती कुईयों के सहारे गांव को साफ सुथरा और कीचड़ मुक्त रखते हैं। तब हम बच्चों को भी खाना खाने से पहले हाथ धोने के लिए टोकते थे। अब तो शिक्षा बढ़ने से लोग और भी जागरूक हो गए हैं। खाने से पहले और खाने के बाद हाथ धोना बच्चों की आदत में शुमार हो गया है। घरों का कचरा भी लोग बाहर भेजने लगे हैं।
आज हम भेड़ों की ढाणी की स्थिति देखें तो वर्तमान में यहां से साल तक के 63 बच्चे हैं। बीते साल में ग्राम पंचायत में न तो कोई बच्चा बीमार हुआ है ना ही किसी शिशु को अकाल मृत्यु का शिकार होना पड़ा है। इसके पीछे बड़ा कारण है ढाणी की स्वच्छता और यहां के लोगों को मिले जल संस्कार। गांव के किसी भी घर में पानी का दुरुपयोग नहीं होता। रसोई और स्नान घर से निकलने वाला पानी भी घर में ही सोख्ता गड्ढा बनाकर जमीन में डाला जाता है। गांव का चौक और गलियां साफ-सुथरी और कीचड़ मुक्त है। गांव के हर घर में नल हैहर घर में शौचालय है। नलों के पास भी घर-घर में सोखती कुईया बनी हुई हैं। ढाणी के लोग अपने खाने-पीने की ज्यादातर सब्जियां भी घर में उगाते हैं। बच्चों में फास्ट फूड के प्रति लगाव कम है। संभवतया यही बड़ा कारण है कि इस गांव में जन्म लेने वाला हर बच्चा स्वस्थ सुडोल और चुस्त-दुरुस्त है।
उप स्वास्थ्य केंद्र भेड़ों की ढाणी की एएनएम विमला बताती है कि उनकी याद में गांव के किसी भी बच्चे को ना तो कोई संक्रमण हुआ है और ना ही जल जनित बीमारी। गांव में एड्सटीबीकैंसर आदि गंभीर बीमारियों का भी कोई रोगी नहीं है। शराब का चलन न के बराबर है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता राजबाला और आशा सहयोगिनी सुमित्रा भी बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर काफी प्रसन्न है। वे बताती हैं कि गांव के बच्चे काफी स्वस्थ है और कभी बीमार भी नहीं होते। गांव की प्राइमरी स्कूल में यूं तो 21 बच्चे ही है लेकिन स्वास्थ्य के लिहाज से सब अच्छे भले हैं। प्रधानाध्यापक जगमोहन बताते हैं कि उनकी स्कूल का कभी कोई बच्चा बीमारी के कारण अनुपस्थित नहीं रहता।
शिशु मृत्यु दर में स्थिति और भी बेहतर
मई 2019 में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (SRS-2017) बुलेटिन जारी किया गया है। इसके मुताबिक 05 वर्ष से कम आयु में मृत्यु दर भारत में प्रति हजार जीवित जन्म के पीछे 33 हैवहीं राजस्थान में यह आंकड़ा प्रति हजार जीवित जन्म के पीछे 38 मृत्यु होने का है। उक्त बुलेटिन में झुंझुनू के ताजा आंकड़े उपलब्ध नहीं है लेकिन जिला शिशु एवं प्रजनन अधिकारी डॉ दयानंद सिंह के मुताबिक झुंझुनू जिले में एक हजार जीवित बच्चों के जन्म लेने के पीछे मृत्यु दर मात्र 22 है। राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक हर साल करीब 18 लाख बच्चे राजस्थान में जन्म लेते हैं। झुंझुनू में शिशु मृत्यु दर कम होने के पीछे भी बड़ा कारण यहां का स्तरीय रहन सहन और खान-पान के प्रति जागरूकता है। भैडो की ढाणी में देखे तो बीते साल के दौरान  जीवित जन्म लेने वाले किसी भी शिशु की मृत्यु नहीं हुई है जबकि इस अवधि के दौरान ढाणी में 63 बच्चों ने जन्म लिया है।
रहन-सहन की बदौलत स्वास्थ्य में आगे
गांव ढाणी के लोगों का जमीन से जुड़ावदेसी रहन-सहन और जागरूकता के बदौलत झुंझुनू की स्थिति राष्ट्रीय एवं राज्य के वनस्पति बेहतर है। आंकड़े बताते हैं कि भारत और खासकर राजस्थान में 0-5 आयु वर्ग के बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी नहीं है। कुपोषण की नजर से बच्चों को तीन वर्गों में बांटा जाता है। पहला अवरुद्ध विकास (हाइट नहीं बढ़ना)दूसरा दुर्बलता और तीसरा कम वजन। अक्टूबर 2019 में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वे (Comprehensive National Nutrition Survey) 2016-18 जारी किया गया है। इसके अनुसार अवरुद्ध विकास की श्रेणी में भारत में 34.7% तथा राजस्थान में 36.8% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसी प्रकार दुर्बलता की श्रेणी में भारत में 17.0% तथा राजस्थान में 14.3% और कम वजन की श्रेणी में भारत में 33.4% तथा राजस्थान में 31.5% बच्चे कुपोषित हैं। झुंझुनूं के संदर्भ में सबसे सबसे ताज़ा आंकड़ा नेशनल फैमिली एंड हैल्थ सर्वे-4 (2015-16) का है। इसके अनुसार झुंझुनूं में कुपोषण का आंकड़ा अवरुद्ध विकास श्रेणी में 32.5%, दुर्बलता की श्रेणी में 13.6 तथा कम वजन की श्रेणी में 19.5 प्रतिशत है।
कुपोषण की दिशा में हो सकता है काम
झुंझुनू के जिला अस्पताल की बात करें तो यहां 2012 में कुपोषण उपचार केंद्र खुला था। तब से अब तक यहां मात्र 853 गंभीर कुपोषित बच्चे उपचार के लिए आए हैं। बकौल केंद्र प्रभारी शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर वीडी बाजिया यूं तो बच्चों में कुपोषण की हालत गंभीर है। कुपोषण उपचार केंद्र में भर्ती किए गए सभी बच्चे गंभीर बीमारी लेकर आए थे जबकि कुपोषित बच्चों को चिह्नित करने का काम आशा और एएनएम के जिम्मे होता है। उनके द्वारा कुपोषित बच्चों को चिह्नित करने का काम सही ढंग से नहीं हो रहा है। आशा व एएनएम के माध्यम से साल में मात्र ही बच्चों को उपचार के लिए भेजा गया है।

 झुंझुनू। भैड़ा की ढाणी में 93 साल की भूराराम घर में अपने पोते प्रतीक से वेस्ट वाटर स्ट्रक्चर सही करते हुए।

                                                    भूराराम भैड़ा
 भेड़ा की ढाणी की कीचड़ मुक्त सड़क


              बेस्ट वाटर के लिए घरों में बनाए गई सोखती कुई।

ढाणी में सार्वजनिक सप्लाई के लिए बनी टंकियाजहां किसी भी तरह का कोई कीचड़ या गंदगी नहीं है।

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